पृथ्वी का निर्माण कैसे हुआ


भोले की भक्ति में सकती 
महाकाल के इतिहास की जानकारी
   शिव की चर्चा , भजनावली
1. शिव गुरु की दृष्टि:-
       जिस वक्त श्रवत्र  केवल अंधेरा ही अंधेरा था , नही सूर्य थी न चंद , ग्रहो - नछत्रों का कहीं पता नही था , न दिन होता था न रात । प्रुथ्वी , जल और वायु की भी नामो निशान न था - उस शमय एकमात्र शिव का ही अस्तित्व था , जो अनादि और चिन्मय कहि जाती थी उन्ही भगवान सदाशिव को वेद , पुराण और उपनिषद तथा संत महात्मा ईश्वर कहते हैं ।

       एक बार भगवान शिव के मन मे सृष्टि रचने की इच्छा हुए|उन्होंने सोचा कि मैं एक से अनेक हो जाऊं । सह विचार आते ही सबसे पहले परमेश्वर शिव ने अपनी प्रा सकती से अम्बिका को प्रकट किया तथा उनसे कहा कि हमे सृस्टि  के लिए किसी दुषरे पुरुष का स्रजन करना चाहिये, जिसकी कंधे पर सृस्टि-संचालन का महान भार रखकर हम आनंदपूर्वक विचरण कर सकें । ऐश निश्चय करके सक्ती सहित परमेश्वर शिव ने अपने वाम अंडग के दशवें भाग पर अमृत मल दिया। वहां से तत्काल एक दिव्य प्रकट हुआ । उसका सौंदर्य
अतुलनीय था। उसमें सत्वगुण की प्रधानता थी। वह परम शांत तथा अथाह सागर की तरह गंभीर था। रेशम पीताम्बर से उसके अंग की सोभा द्विगुणित हो रही थी । उसके चारों हाथों में संख , चक्र , गदा और परम सुशोभित थे।

   
         उस इंसन ने भगवान शिव को प्रणाम करते हुवे कहा है प्रभु मुझे मेरे नाम व काम प्रदान करें । तो शिव जी ने उसकी बात सुनकरमुश्करते हुवे जवाब दिया :- 'वत्स वयापक होने के कारण  तुम्हारा नाम विष्णु होगा । सृस्टि का पालन कॉर्न तुम्हारा कार्य होगा । 
       भगवान शिव का आदेश पालन कररते हुवे श्री विष्णु कठोर तपस्या करने लगे  । इस तपस्या में उनके अंग से जल निकलने लगे उससे आकाश जो सुना था वो जल से भर गया । अंततः उन्होंने थक कर उसी जल में स्यान किया । 
जल   यानी 'नार' में सायं करने के कारण उनका एक नाम 'नारायण' हो गया।
         और विष्णु जी के सदा सीए रहने के कारण उनके नाभि से एक कमल की उत्पत्ति हुई जिसको शिव शम्भू ने अपने दाहिने अंग से ब्रम्हा जी को उस पुष्प के ऊपर बैठा दिया और तत्पश्चात श्री ब्रम्हा  जी को यह पता न चल पाया कि उनकी उत्पति कैसे हुई । फिर एक सकमे श्री ब्रम्हा और विष्णु के बीच विवाद छिड़ गई तभी वहां से एक उजाला प्रकट हुआ ठक्कर श्री विष्णु जी ने उनको प्रणाम करते हुवे पूछा 'महाप्रभु' हैम आपके स्वरूप को नही जानते । आप जो कोई भी हो हमे दर्शन दो । 
                                       श्री विष्णु की प्रार्थना सुन कर शिव प्रभु प्रकट हुवे और बोले :- 'शुरश्रेस्ग्न' ! मैं दोनो के ताप और भक्ति से भली भांति संतुस्ट हुन। ब्रम्हा! तुम मेरी आज्ञा से जगत की सृस्टि करो और विष्णु ! तुम इस चरा
      चराचर जगत का पालन करो तदंतर परमेश्वर शिवने अपने ह्रदय भाग से रूद्र को प्रकट किया और उन्हें संहार का दायित्व सौंपकर वही अंतर्ध्यान हो गए

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